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Friday, 21 March 2014

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।
अर्थ : यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है.
जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।
अर्थ : जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते  हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है. लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते.
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
अर्थ : सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए. तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का.
दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।
अर्थ : यह मनुष्य का स्वभाव है कि जब वह  दूसरों के दोष देख कर हंसता है, तब उसे अपने दोष याद नहीं आते जिनका न आदि है न अंत.
जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।
अर्थ : जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते  हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है. लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते.
बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।
अर्थ : यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है.
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।
अर्थ : न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है. जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है.
निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।
अर्थ : जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिकाधिक पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है.
दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।
अर्थ : इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है. यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता  झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं
लगता.
कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर.
अर्थ : इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो !
हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी  मुए, मरम न कोउ जाना।
अर्थ : कबीर कहते हैं कि हिन्दू राम के भक्त हैं और तुर्क (मुस्लिम) को रहमान प्यारा है. इसी बात पर दोनों लड़-लड़ कर मौत के मुंह में जा पहुंचे, तब भी दोनों में से कोई सच को न जान पाया।
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।
अर्थ : मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है. अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु  आने पर ही लगेगा !

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।
अर्थ : कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है. यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है !
 साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।
अर्थ : इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है. जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे.
 साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।
अर्थ : इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है. जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे.
 पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
अर्थ : बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके. कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा.
 पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
अर्थ : बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके. कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा.
 पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
अर्थ : बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके. कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा.
कह रैदास चरम सत्ज्ञानी ! बोलहिं आपु बिसेखा बानी !!
अर्थ- सत्गुरू रविदास जी महाराज कहते हैं कि केवल अपनी विशेष बात कहने वाला मानव ही सबसे बड़ा सच्चा ज्ञानी होता है न कि किसी दूसरे की कही-सुनी-पढ़ी हुई बातों को सुनकर या पढ़कर कहने वाला चोरचुगलख़ोर !
"कबीर दास के दोहे हिन्दी में" - कबीरा खड़ा बाज़ार में माम्गे सब की खैर ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर!... http://t.co/0g7Q0TN1yX
कबीर दास के दोहे हिन्दी में
tmblr.co
कबीरा खड़ा बाज़ार में माम्गे सब की खैर ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर! बुरा जो देखन में चला, बुरा ना मिलया कोई, जो मन खोजा आपना तो मुझ से बुरा ना कोई चलती चाक्की देख के दिया कबीरा रोए दुइ पाटन के...
Photo: बुद्ध एक बल आपका ,बुद्ध ऐक सुविचार ! बुद्ध बनो बुद्धी चुनो , जग में हो उजयार !http://t.co/5ldaXbjyE7






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  1. Virbhan Bansal posted a photo on Tumblr.
    बहुजन के गौरव तुम्ही,बहुजन की हो शान ! फिर क्यूँ बहुजन न करें , बाबा के गुण गान !
जल सत्याग्रह कर बाबा ने ,
सबको जीवन दान दिया !
दबे और कुचले लोगों को ,
बढ़ चढ़ कर सम्मान दिया !!
उनका यह बलिदान अनोखा ,
व्यर्थ नहीं जाने देंगे !
अपने सम्मानों पे सच में ,
आंच नहीं आने देंगे !!!
!!! सप्रेम जय भीम !!! ,

Saturday, 1 February 2014

बाबा साहेब के पेज को अवश्य लाइक करें

युगपुरुष बाबा साहेब ने अपने सारे सुख त्याग कर अपना जीवन बहुजन समाज को
उनके अधिकार दिलाने, शिक्षित करने व सम्मान के साथ जीने में लगा दिया और वे 
कामयाब भी हुए, जिसके फलस्वरूप आज हमारे समाज में डॉक्टर, इंजीनियर, आई०ए०एस०, 
पी०सी०एस०, विधायक, मंत्री, सहित हर श्रेणी के अधिकारी कर्मचारी बन ने लगे.
जिसके जैसे स्थिति सुधरने लगी शहरों में मकान बना कर रहने लगे,
लेकिन वे अपने उस समाज को भूल गए जहाँ से वे खुद उठकर आये थे
जिनको बाबा साहेब ने इस काबिल बनाया कि ये लोग आगे चल कर अपने समाज
को शिक्षित, संगठित करे, और उन्हें गुलामी का अहसास दिलाकर सम्मान के साथ
जीने को आंदोलित करे, लेकिन वे तो अब अपने स्वार्थ तक ही सिमित रह गए,
दोस्तों हम सब को चाहिए कि अगर बाबा साहेब का मिशन पूरा करना है तो
हमें अपने दलित-शोषित समाज को साथ लेकर आगे बढे. अपने लोगो में
बाबा साहेब के मिशन के प्रति जागरूकता पैदा करे.
जय भीम जय भारत
बाबा साहेब के पेज को अवश्य लाइक करें l

Friday, 31 January 2014



26 जनवरी 1950 को भारत एक गणतंत्र होगा यानि इस दिन से देश जनता के लिए जनता से जनता के द्वारा संचालित होगा. लेकिन यहाँ भी मेरे मन में वहीँ विचार आता है कि देश के जनतंत्र का क्या होगा? क्या हमारा देश गणतंत्र को संभाल पायेगा या वह इसे खो देगा? यह दूसरा विचार भी मुझे पहले की ही तरह बेचैन कर देता है. ऐसा नहीं है कि भारत यह नहीं जानता कि गणतंत्र क्या है? एक समय था जब भारत में बहुत से गणतंत्र हुआ करते थे, यहाँ तक कि राजतंत्र में राजा का पद भी चुनाव से ही निर्धारित होता था. ऐसा भी नहीं कि भारत संसद और संसदीय कार्यप्रणाली से अनभिज्ञ था. यदि हम बौद्ध भिक्खु संघ का अध्ययन करें तो पाते हैं कि संघ गणतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप ठीक वैसे ही कार्य करते थे जैसे आधुनिक गणतंत्र. उनके बैठने, प्रस्ताव पारित करने, कोरम, व्हिप, वोटों की गिनती, निंदा प्रस्ताव और अन्य नियम बुद्ध ने संघ के लिए निर्धारित किये थे, शायद उन्होंने ये सारे नियम प्रचलित गणतंत्रो से ही लिए होंगे. भारत में एक समय बाद यह जनतांत्रिक व्यवस्था लुप्त हो गयी. क्या अब यह दूसरी बार भी लुप्त हो जायेगी? मैं नहीं जानता, लेकिन भारत जैसे देश जहाँ हजारों साल तक जनतंत्र नष्ट रहा वहाँ दोबारा जनतंत्र का आगमन एक नई घटना है. लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि गणतंत्र को जिस बात से खतरा है वह तानाशाही है. भारत जहाँ गणतंत्र अपने शैशव अवस्था में है वहाँ यह संभावना है कि देश में उपरी तौर पर तो लोकतंत्र रहे पर असल में तानाशाही स्थापित हो जाए. इस बात कि काफी हद तक सम्भावना है. मेरे हिसाब से इसके लिए सबसे पहले यह ज़रूरी होगा कि हम अपने सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों को ही अपनाए. इसका मतलब हुआ कि यह ज़रूरी है कि हमें क्रांति के लिए खूनी संघर्ष के रास्ते को त्यागना होगा. यानि अब हमें सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रहों को भी त्यागना होगा. जब आर्थिक और सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीके नहीं बचते तब किसी रूप में असंवैधानिक तरीकों को न्यायसंगत ठहराया जा सकता है. लेकिन इन तरीकों को हमें अराजकता फ़ैलाने वाला समझ कर इन्हें अपना लक्ष्य हासिल करने के बाद तुरंत ही छोड़ दिया जाना चाहिए. हमारे लिए यही बेहतर होगा. दूसरी बात भारत हमेशा से ही भक्ति और श्रद्धा कि मानसिकता का पालन करता रहा है, जिससे नायक पूजा का मार्ग प्रशस्त होता है. नायक पूजा अंततः तानाशाही को ही जन्म देती है. तीसरी बात कि हम सिर्फ राजनीतिक गणतंत्र के बारे में ही नहीं सोचे बल्कि हमें अपने राजनीतिक गणतंत्र को सामाजिक गणतंत्र भी बनाना होगा. राजनीतिक गणतंत्र तब तक कायम नहीं रह सकता जब तक कि उसका आधार सामाजिक गणतंत्र न हो. प्रश्न उठता है कि सामाजिक गणतंत्र आखिर क्या होता है? यह जीवन की वह शैली है जिसमें जीवन का सिद्धांत समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व हो. इन तीनों तत्वों को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता. भारतीय सन्दर्भ में समता का कोई नामो-निशान नहीं हैं सामजिक रूप से यहाँ वर्गीकृत असमानता है, मतलब एक जाति दूसरी से ऊँची या नीची है. आर्थिक आधार पर देखे तो यहाँ कुछ लोग अपार धन-दौलत वाले हैं तो कुछ भीषण गरीबी से जूझ रहे हैं. 26 जनवरी 1950 को हम ऐसे विरोधाभास में प्रवेश कर रहे हैं. राजनीति में हम समता मिलेगी पर सामाजिक और आर्थिक जीवन में हमें विषमता मिलेगी. राजनीति में हम एक व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को अपनाएंगे लेकिन अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में विषमता पायेंगे क्योंकि वहाँ हमारी सामाजिक संरचना के अनुरूप हम एक व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को खारिज करते हैं. आखिर हम कब तक सामाजिक-आर्थिक जीवन में समता को खारिज करते रहेंगे? यदि हम लंबे समय तक समता को नहीं स्वीकारेंगे तो हमारा राजनीतिक गणतंत्र भी लंबे समय तक कायम नहीं रह पायेगा. हमें इस विरोधाभास को जितना जल्द हो दूर करना होगा नहीं तो वे लोग जो विषमता का शिकार हो रहे हैं इस राजनीतिक गणतंत्र की संरचना को उखाड फेकेंगे जिसे इस देश की संसद ने बड़ी मेहनत से तैयार किया है.




26 जनवरी 1950 को भारत एक गणतंत्र होगा यानि इस दिन से देश जनता के लिए जनता से जनता के द्वारा संचालित होगा. लेकिन यहाँ भी मेरे मन में वहीँ विचार आता है कि देश के जनतंत्र का क्या होगा? क्या हमारा देश गणतंत्र को संभाल पायेगा या वह इसे खो देगा? यह दूसरा विचार भी मुझे पहले की ही तरह बेचैन कर देता है.

ऐसा नहीं है कि भारत यह नहीं जानता कि गणतंत्र क्या है? एक समय था जब भारत में बहुत से गणतंत्र हुआ करते थे, यहाँ तक कि राजतंत्र में राजा का पद भी चुनाव से ही निर्धारित होता था. ऐसा भी नहीं कि भारत संसद और संसदीय कार्यप्रणाली से अनभिज्ञ था.
यदि हम बौद्ध भिक्खु संघ का अध्ययन करें तो पाते हैं कि संघ गणतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप ठीक वैसे ही कार्य करते थे जैसे आधुनिक गणतंत्र. उनके बैठने, प्रस्ताव पारित करने, कोरम, व्हिप, वोटों की गिनती, निंदा प्रस्ताव और अन्य नियम बुद्ध ने संघ के लिए निर्धारित किये थे, शायद उन्होंने ये सारे नियम प्रचलित गणतंत्रो से ही लिए होंगे.
भारत में एक समय बाद यह जनतांत्रिक व्यवस्था लुप्त हो गयी. क्या अब यह दूसरी बार भी लुप्त हो जायेगी? मैं नहीं जानता, लेकिन भारत जैसे देश जहाँ हजारों साल तक जनतंत्र नष्ट रहा वहाँ दोबारा जनतंत्र का आगमन एक नई घटना है. लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि गणतंत्र को जिस बात से खतरा है वह तानाशाही है.
भारत जहाँ गणतंत्र अपने शैशव अवस्था में है वहाँ यह संभावना है कि देश में उपरी तौर पर तो लोकतंत्र रहे पर असल में तानाशाही स्थापित हो जाए. इस बात कि काफी हद तक सम्भावना है.
मेरे हिसाब से इसके लिए सबसे पहले यह ज़रूरी होगा कि हम अपने सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों को ही अपनाए. इसका मतलब हुआ कि यह ज़रूरी है कि हमें क्रांति के लिए खूनी संघर्ष के रास्ते को त्यागना होगा. यानि अब हमें सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रहों को भी त्यागना होगा.
जब आर्थिक और सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीके नहीं बचते तब किसी रूप में असंवैधानिक तरीकों को न्यायसंगत ठहराया जा सकता है. लेकिन इन तरीकों को हमें अराजकता फ़ैलाने वाला समझ कर इन्हें अपना लक्ष्य हासिल करने के बाद तुरंत ही छोड़ दिया जाना चाहिए. हमारे लिए यही बेहतर होगा.
दूसरी बात भारत हमेशा से ही भक्ति और श्रद्धा कि मानसिकता का पालन करता रहा है, जिससे नायक पूजा का मार्ग प्रशस्त होता है. नायक पूजा अंततः तानाशाही को ही जन्म देती है.
तीसरी बात कि हम सिर्फ राजनीतिक गणतंत्र के बारे में ही नहीं सोचे बल्कि हमें अपने राजनीतिक गणतंत्र को सामाजिक गणतंत्र भी बनाना होगा. राजनीतिक गणतंत्र तब तक कायम नहीं रह सकता जब तक कि उसका आधार सामाजिक गणतंत्र न हो. प्रश्न उठता है कि सामाजिक गणतंत्र आखिर क्या होता है?
यह जीवन की वह शैली है जिसमें जीवन का सिद्धांत समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व हो. इन तीनों तत्वों को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता. भारतीय सन्दर्भ में समता का कोई नामो-निशान नहीं हैं सामजिक रूप से यहाँ वर्गीकृत असमानता है, मतलब एक जाति दूसरी से ऊँची या नीची है. आर्थिक आधार पर देखे तो यहाँ कुछ लोग अपार धन-दौलत वाले हैं तो कुछ भीषण गरीबी से जूझ रहे हैं.
26 जनवरी 1950  को हम ऐसे विरोधाभास में प्रवेश कर रहे हैं. राजनीति में हम समता मिलेगी पर सामाजिक और आर्थिक जीवन में हमें विषमता मिलेगी. राजनीति में हम एक व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को अपनाएंगे लेकिन अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में विषमता पायेंगे क्योंकि वहाँ हमारी सामाजिक संरचना के अनुरूप हम एक व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को खारिज करते हैं.
आखिर हम कब तक सामाजिक-आर्थिक जीवन में समता को खारिज करते रहेंगे?
यदि हम लंबे समय तक समता को नहीं स्वीकारेंगे तो हमारा राजनीतिक गणतंत्र भी लंबे समय तक कायम नहीं रह पायेगा. हमें इस विरोधाभास को जितना जल्द हो दूर करना होगा नहीं तो वे लोग जो विषमता का शिकार हो रहे हैं इस राजनीतिक गणतंत्र की संरचना को उखाड फेकेंगे जिसे इस देश की संसद ने बड़ी मेहनत से तैयार किया है.