*चुनाव पर ही हमारे जीने और मरने का प्रश्न निर्भर है , इस जीने मरने के युद्ध में हमारा विजय होना चाहिए। — डॉ भीम राव अम्बेडकर जी
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Thursday, 31 July 2014
Monday, 28 July 2014
महामानव, युगपुरुष, संविधान निर्माता बाबा साहेब डा. बी.आर.आंबेडकर जी ने बहुजन समाज को अगाह करते हुए कहा है, कि "अपने पैरों पर खड़े होने के लिए सबसे पहले अपने खुद के इतिहास को समझना बहुत जरुरी है, अन्यथा मनुवादी समाज के लोग हमारी इस कमजोरी का फ़ायदा उठाकर हमारे ऊपर हुकूमत करते रहेंगे, जिसके कारण जिन्दगी के हर पहलु में बहुजन समाज का आगे बढ़ना बहुत मुश्किल हो जायेगा l
जय भीम जय प्रबुद्ध भारत
जय भीम जय प्रबुद्ध भारत
Sunday, 27 July 2014
"हमें अपने लिये नहिं अपनो के लिये काम करना है ,
"हमें अपने लिये नहिं अपनो के लिये काम करना है ,
इसलिए मैने तय कर लिया की मेरा कोई घर,प्राँपर्टी नहि होगी ताकि मै अपना पूरा वक्त बहुजन समाज को दुं ,
और बाबासाहब का अधुरा सपना पूरा करूँ ."
_ मान्यवर कांशीरामजी .
!! जय भीम जय भारत !!
इसलिए मैने तय कर लिया की मेरा कोई घर,प्राँपर्टी नहि होगी ताकि मै अपना पूरा वक्त बहुजन समाज को दुं ,
और बाबासाहब का अधुरा सपना पूरा करूँ ."
_ मान्यवर कांशीरामजी .
!! जय भीम जय भारत !!
कबीरजी ने कहा है .........
पोथी पढ मुहिय्या पंडित भया न कोय ।
ढाई अक्षर प्रेम के पढले सो पंडित हो जाय ।।
इस बात को बड़े आसानी से समजे
मतलब सीधा है । सभीसे प्यार करो......!
लेकिन हम लोग आदमी से ज्यादा धर्म को मानते है । धर्म का मतलब है ,धारण करे सो धर्म । लेकिन यहाँ तो सम्प्रदाय को ही धर्म मानते है ।
आएदिन जातिवाद के शिकार हमारे लोग हो रहे है । और भलेही मोदिको हमारा वैचारिक विरोध है , लेकिन हम लोकतंत्र को मानने और जानने वालोमेसे है । मोदी को प्रधान मंत्री बनते हुए देखा । हमें उनसे यह उम्मीद थी की वे गंगा के
साथ साथ इस देश के हजारो ......
गावमें / देहातोमे बसे हुए करोड़ो गंगाराम के बारे में भी सोचते.
जो इस देश में हर दिन जातिवाद के शिकार हो रहे है ? साथियों कब तक ऐसा चलेगा ? हमारे आने वाली नस्लोका क्या होगा ? या फिर वही दिन ?
ऐसे बहोत सवाल मन के अंदर बैठे है ।आगे क्या होगा यह सोचकर......??????????
पोथी पढ मुहिय्या पंडित भया न कोय ।
ढाई अक्षर प्रेम के पढले सो पंडित हो जाय ।।
इस बात को बड़े आसानी से समजे
मतलब सीधा है । सभीसे प्यार करो......!
लेकिन हम लोग आदमी से ज्यादा धर्म को मानते है । धर्म का मतलब है ,धारण करे सो धर्म । लेकिन यहाँ तो सम्प्रदाय को ही धर्म मानते है ।
आएदिन जातिवाद के शिकार हमारे लोग हो रहे है । और भलेही मोदिको हमारा वैचारिक विरोध है , लेकिन हम लोकतंत्र को मानने और जानने वालोमेसे है । मोदी को प्रधान मंत्री बनते हुए देखा । हमें उनसे यह उम्मीद थी की वे गंगा के
साथ साथ इस देश के हजारो ......
गावमें / देहातोमे बसे हुए करोड़ो गंगाराम के बारे में भी सोचते.
जो इस देश में हर दिन जातिवाद के शिकार हो रहे है ? साथियों कब तक ऐसा चलेगा ? हमारे आने वाली नस्लोका क्या होगा ? या फिर वही दिन ?
ऐसे बहोत सवाल मन के अंदर बैठे है ।आगे क्या होगा यह सोचकर......??????????
" तू धार बन , तू तलवार बन--
एक नये कार्यकर्ताने मुझे पूछा आप हमेशा चमचा लोगोके बारे में क्यों लिखते हो....? या फिर चमचा लोग इस शब्दका प्रयोग बार बार क्यों करते हो ? आखिर ये चमचा लोग है कौन ? ऐसे सवाल मेरे उस कार्यकर्ता भाई ने मुझे
पूछे ? मैंने मेरे उस मासूम को अपने हिसाब से सम्जानेकी कोशिश तो की । मगर उसका समाधान नहीं कर सका । अन्तमे मैंने उसे मान्यवर साहब कांशीरामजी इनके द्वारा लिखी हुई किताब .......
" चमचा युग " अंग्रेजी में "चमचा एज " यह किताब मैने उसे पढ़ने के लिए कहा ।और वह चला गया । फिर दो दिन बाद मुझे रास्ते में मिला । तब उसने बताया मुझे किताब पढने के लिए मिली नहीं । खैर मै तो उसे जरुर पढूगा । लेकिन कमसे कम मुझे थोडा समजाइए ...!
तब मैंने उसे कहा आपने कभी आपके रसोईघर(किचन रूम) में कभी किस तरह सब्जी बनाते यह देखा है क्या ? उसने कहा हाँ मैंने देखा है । लेकिन इतना गौर नहीं किया कभी ...!
तो मैंने कहा भाई बगैर चमचे की कोई भी सब्जी, तरकारी नहीं बनती है । लेकिन जिस चमचे के बगैर वह सब्जी नहीं बन सकी, उस चमचे को कभी यह पता नहीं चलता के सब्जी कैसे बनी
है ? वैसेही हमारे में कुछ चमचे ऐसे है ... जिन चमचो के वजहसे हमारा हित शत्रु तो सब कुछ हासिल कर लेता है। मगर काम पूरा होने के बाद उसे कोईभी कुछ नहीं पूछता है । ऐसे चमचा लोगोकी वजहसे हमारा मोवमेंट का सही काम नहीं होता है । हर समय बहुजन समाजके हर नेत्रुत्व के संघर्ष को रोकने के लिए हमारा दुश्मन उस नेतृत्व के सामने उसी के समाजके कुछ चमचोको तैयार करते है । और उसके उस काम को रोकनेकी कोशिश की जाती है ।ऐसे चमचे हर वक्त होते है । इसलिए मान्यवर साहब कांशीरामजी को यह किताब लिखनी पड़ी ।
चमचा लोगोकी वजहसे आज हमारी यह हालात हो गई है । इस लिए ।मैंने उसे समजाया उसे मैंने एक सन्देश भी दिया जो मान्यवर साहब कांशीरामजी ने हमें दिया है ।वे कहते है ।
" तू धार बन , तू तलवार बन ,
तू चाकू बन, तू छुरी बन ..... !
पर तू किसीका चमचा मत बन .....! "
उस नए कर्यजर्ता को मेरी यह बात बहोत अछि लगी और उसने कहा ।
भलेही मै... चाकू , छुरी, तलवार नहीं बनुगा मगर " मै कभी किसीका चमचा नहीं बनूँगा ..!
मुझे बड़ा अच्छा लगा आपको ?????????
जयभीम .....! जय भारत....!!
पूछे ? मैंने मेरे उस मासूम को अपने हिसाब से सम्जानेकी कोशिश तो की । मगर उसका समाधान नहीं कर सका । अन्तमे मैंने उसे मान्यवर साहब कांशीरामजी इनके द्वारा लिखी हुई किताब .......
" चमचा युग " अंग्रेजी में "चमचा एज " यह किताब मैने उसे पढ़ने के लिए कहा ।और वह चला गया । फिर दो दिन बाद मुझे रास्ते में मिला । तब उसने बताया मुझे किताब पढने के लिए मिली नहीं । खैर मै तो उसे जरुर पढूगा । लेकिन कमसे कम मुझे थोडा समजाइए ...!
तब मैंने उसे कहा आपने कभी आपके रसोईघर(किचन रूम) में कभी किस तरह सब्जी बनाते यह देखा है क्या ? उसने कहा हाँ मैंने देखा है । लेकिन इतना गौर नहीं किया कभी ...!
तो मैंने कहा भाई बगैर चमचे की कोई भी सब्जी, तरकारी नहीं बनती है । लेकिन जिस चमचे के बगैर वह सब्जी नहीं बन सकी, उस चमचे को कभी यह पता नहीं चलता के सब्जी कैसे बनी
है ? वैसेही हमारे में कुछ चमचे ऐसे है ... जिन चमचो के वजहसे हमारा हित शत्रु तो सब कुछ हासिल कर लेता है। मगर काम पूरा होने के बाद उसे कोईभी कुछ नहीं पूछता है । ऐसे चमचा लोगोकी वजहसे हमारा मोवमेंट का सही काम नहीं होता है । हर समय बहुजन समाजके हर नेत्रुत्व के संघर्ष को रोकने के लिए हमारा दुश्मन उस नेतृत्व के सामने उसी के समाजके कुछ चमचोको तैयार करते है । और उसके उस काम को रोकनेकी कोशिश की जाती है ।ऐसे चमचे हर वक्त होते है । इसलिए मान्यवर साहब कांशीरामजी को यह किताब लिखनी पड़ी ।
चमचा लोगोकी वजहसे आज हमारी यह हालात हो गई है । इस लिए ।मैंने उसे समजाया उसे मैंने एक सन्देश भी दिया जो मान्यवर साहब कांशीरामजी ने हमें दिया है ।वे कहते है ।
" तू धार बन , तू तलवार बन ,
तू चाकू बन, तू छुरी बन ..... !
पर तू किसीका चमचा मत बन .....! "
उस नए कर्यजर्ता को मेरी यह बात बहोत अछि लगी और उसने कहा ।
भलेही मै... चाकू , छुरी, तलवार नहीं बनुगा मगर " मै कभी किसीका चमचा नहीं बनूँगा ..!
मुझे बड़ा अच्छा लगा आपको ?????????
जयभीम .....! जय भारत....!!
बुद्ध ने विश्व के मूल तत्त्व को विज्ञान (नाम) और भौतिक तत्त्व को (रूप) में बाँटा है, इस से आत्मा का अस्तित्व अमान्य किया हैं। इनके बारे में राजा मिनान्दर ने बौध्द भिक्खू नागसेन से पूछा-
"भंते! ....नाम क्या चीज़ है और रूप क्या चीज?"
"महाराज! जितनी स्थूल चीज़ें हैं, सभी रूप हैं, और जितने सूक्ष्म मानसिक धर्म हैं, सभी नाम हैं।..... दोनों एक दूसरे के आश्रित हैं, एक दूसरे के बिना ठहर नहीं सकते। दोनों सदा साथ ही होते हैं। ...यदि मुर्गी के पेट में (बीज रूप में) बच्चा नहीं हो तो अंडा भी नहीं हो सकता; क्योंकि बच्चा और अंडा दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं। दोनों एक ही साथ होते हैं। यह (सदा से)... होता चला आया है।..."
कर्म या पुनर्जन्म:
आत्मा के न मानने पर किये गये भले बुरे कर्मों की जिम्मेवारी तथा उसके अनुसार परलोक में दु:ख-सुख भोगना कैसे होगा, मिनान्दर ने इसकी चर्चा चलाते हुए कहा।
"भंते! कौन जन्म ग्रहण करता है?"
"महाराज! नाम (विज्ञान) और रूप...
"क्या यही नाम-रूप जन्म ग्रहण करता है?"
"महाराज! यही नाम और रूप जन्म नहीं ग्रहण करता। मनुष्य इस नाम और रूप से पाप या पुण्य़ करता है, उस कर्म के करने से दूसरा नाम रूप जन्म ग्रहण करता है।"
भंते! तब तो पहला नाम और रूप अपने कर्मों से मुक्त हो जाता है?"
"महाराज! यदि फिर भी जन्म नहीं ग्रहण करे, तो मुक्त हो गया; किंतु चूँकि वह फिर भी जन्म ग्रहण करता है, इसलिए (मुक्त) नहीं हुआ।"
"...उपमा देकर समझावें।"
आम की चोरी
कोई आदमी किसी का आम चुरा ले। उसे आम का मालिक पकड़ कर राजा के पास ले जाये- राजन्! इसने मेरा आम चुराया है'।
इस पर वह (चोर) ऐसा कहे- 'नहीं', मैंने इसके आमों को नहीं चुराया है। इसने (जो आम लगाया था) वह दूसरा था, और मैंने जो आम लिये वे दूसरे हैं।... महाराज! अब बताएँ कि उसे सज़ा मिलनी चाहिए या नहीं",
"... सज़ा मिलनी चाहिए।"
"सो क्यों?"
"भंते! वह ऐसा भले ही कहे, किंतु पहले आम को छोड़ दूसरे ही को चुराने के लिए उसे ज़रूर सज़ा मिलनी चाहिए।"
"महाराज! इसी तरह इस नाम और रूप से पाप या पुण्य... करता है।
उन कर्मों से दूसरा नाम और रूप जन्मता है। इसीलिए वह अपने कर्मों से मुक्त नहीं हुआ।
दीपक से आग लगना
महाराज! कोई आदमी दीया लेकर अपने घर के उपरले छत पर जाये और भोजन करे। वह दीया जलता हुआ कुछ तिनकों में लग जाये। वे तिनके घर को (आग) लगा दें, और वह घर सारे गाँव को आग लगा दे। गाँववाले उस आदमी को पकड़कर कहें- 'तुमने गाँव में क्यों आग लगाई?' इस पर वह कहे- मैंने गाँव में आग नहीं लगाई। उस दीये की आग दूसरी ही थी, जिसकी रोशनी में मैंने भोजन किया था, और वह आग दूसरी ही थी, जिसने गाँव जलाया।' इस तरह आपस में झगड़ा करते (यदि) वे आपके पास आवें तो आप किधर फैसला देंगे?"
"भंते! गाँववालों की ओर...।"
"महाराज! इसी तरह यद्यपि मृत्यु के साथ एक नाम और रूप का लय होता है और जन्म के साथ दूसरा नाम और रूप उठ खड़ा होता है, किंतु यह भी उसी से होता है। इसलिए वह अपने कर्मों से मुक्त नहीं हुआ।"
विवाहित कन्या
महाराज! कोई आदमी... रुपया दे एक छोटी सी लड़की से विवाह कर, कहीं दूर चला जाये। कुछ दिनों के बाद वह बढ़कर जवान हो जाये। तब कोई दूसरा आदमी रुपया देकर उससे विवाह कर ले। इसके बाद पहला आदमी आकर कहे-
'तुमने मेरी स्त्री को क्यों निकाल लिया? इस पर वह ऐसा जवाब दे- मैंने तुम्हारी स्त्री को क्यों निकाला। वह छोटी लड़की दूसरी ही थी, जिसके साथ तुमने विवाह किया था और जिसके लिए रुपये दिये थे। यह सयानी, जवान औरत दूसरी ही है जिसके साथ मैंने विवाह किया है और जिसके लिए रुपये दिये हैं। अब यदि दोनों इस तरह झगड़ते हुए आपके पास आवें...
तो आप किधर फैसला देंगे?
"... पहले आदमी की ओर।...(क्योंकि)वही लड़की तो बढ़कर सयानी हुई।"
अन्य विचार
"भंते! जो उत्पन्न है, वह वही व्यक्ति है या दूसरा?"
"न वही और न दूसरा ही।...
प्रथम
जब आप बच्चे थे और खाट पर चित्त ही लेट सकते थे, क्या आप अब इतने बड़े होकर भी वही हैं?"
"नहीं भंते! अब मैं दूसरा हो गया हूँ।"
"महाराज! यदि आप वही बच्चा नहीं हैं, तो अब आपकी कोई माँ भी नहीं है, कोई पिता भी नहीं है, कोई गुरु भी नही... क्योंकि तब तो गर्भ की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं की भी भिन्न-भिन्न माताएँ होयेंगे। बड़े होने पर माता भी भिन्न हो जायेगी। शिल्प सीखने वाला (विद्यार्थी) दूसरा और सीखकर तैयार (हो जाने पर) ...दूसरा होगा। अपराध करने वाला दूसरा होगा और (उसके लिए) हाथ-पैर किसी दूसरे का काटा जायेगा।"
"भंते!... आप इससे क्या दिखाना चाहते हैं?"
"महाराज! मैं बचपन में दूसरा था और इस समय बड़ा होकर दूसरा हो गया हूँ; किंतु वह सभी भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ इस शरीर पर ही घटने से एक ही में ले ली जाती हैं।...
द्वितीय
यदि कोई आदमी दीया जलावे, तो वह रात भर जलता रहेगा न ?"
"...रात भर जलता रहेगा।"
"महाराज! रात के पहले पहर में जो दीये की टेम थी। क्या वही दूसरे या तीसरे पहर में भी बनी रहती है?"
"नहीं, भंते!"
"महाराज! तो क्या वह दीया पहले पहर में दूसरा, दूसरे और तीसरे पहर में और हो जाता है?"
"नहीं भंते! वही दीया सारी रात जलता रहता है।"
"महाराज! ठीक इसी तरह किसी वस्तु के अस्तित्व के सिलसिले में एक अवस्था उत्पन्न होती है, एक लय होती है- और इस तरह प्रवाह जारी रहता है। एक प्रवाह की दो अवस्थाओं में एक क्षण का भी अंतर नहीं होता; क्योंकि एक के लय होते ही दूसरी उत्पन्न हो जाती है। इसी कारण न (वह) वही जीव है और न दूसरा ही हो जाता है। एक जन्म के अंतिम विज्ञान (चेतना) के लय होते ही दूसरे जन्म का प्रथम विज्ञान उठ खड़ा होता है।
"भंते! जब एक नाम-रूप से अच्छे या बुरे कर्म किये जाते हैं, तो वे कर्म कहाँ ठहरते हैं?"
"महाराज! कभी भी पीछा नहीं छोड़ने वाली छाया की भाँति वे कर्म उसका पीछा करते हैं।"
"भंते! क्या वे कर्म दिखाये जा सकते हैं, (कि) वह यहाँ ठहरे हैं?"
"महाराज! वे इस तरह नहीं दिखाये जा सकते।... क्या कोई वृक्ष के उन फलों को दिखा सकता है जो अभी लगे ही नही..
हम तो सिर्फ बाबासाहब कोही सबकुछ मानते है ।
कोई ईश्वर माने या ना माने यह जिसकी उसकी सोच है । हम तो सिर्फ बाबासाहब कोही सबकुछ मानते है । बाबासाहब हमारे लिए किसी भी ईश्वर से कम नहीं है । जो भी ईश्वर को मानता है , वह किसलिए मानता है ? ऐसा अगर हमने किसीसे पूछा तो वह कहते है ... भगवान् को इस लिए वे मानते है क्योंकि आज वे जो कुछ भी है वह सिर्फ इश्वर की बदौलत है । साथियो मै आपसे पूछता हूँ ... दुनिया में ऐसा एक भी इंसान नहीं जो कहे के उसने ईश्वर को देखा है । फिर वे उस ईश्वर के नाम से क्या नहीं करते है ? सबेरे से लेकर शाम तक इश्वर के ही उलझन में रहते है । ईश्वर के प्रति दो चीजे सामने आती है । पहला श्रद्धा और दुसरा खौप खैर इन बातो में मै ज्यादा उलझनानहीं चाहूँगा क्योंकि यह मेरा विषय नहीं है । मै तो सिर्फ यह सोचके परेशान हो रहा हूँ के , जिस बाबासाहब ने हमको हमारे
माँ/ बाप और ईश्वर से ज्यादा दिया । हमने हमारे बाबासाहब के प्रति क्या किया ? क्योंकि हमारा भी फर्ज बनता है । के हमने कुछ ना कुछ तो भी करना चाहिए । लेकिन हमारे लोग सिर्फ बाते करते है ।
मगर कुछ भी नही करते है .!! जो हमारे मुक्तिदाताने हमसे उम्मीद की थी । उन्होंने हमारे सामने दो लक्ष रखे है ।
(1) हमें इस देश का शासक बनना..sss ????
(2) भारत को बौद्धमय बनाना..sssss ???? लक्ष बड़ा कठिन है । मगर हमने उसपर पूरा ध्यान केन्द्रित करना चाहिए । और यह लक्ष पूरा करना तभी संभव है , जब हम आपने आपको स्वाभिमानी बापकी स्वाभिमानी औलाद बना सके । लेकिन हमारी समस्या यह है की , हम नाम तो बाबा का लेते है । मगर काम बापू का करते है । जब तक हम .........
" जयभीम जयभीम गाते चलो और बापूजी का दर्शन लेते चलो ऐसी स्थिति जब तक हमारी है । तब यह बात नहीं होगी इसलिए हमे पहले लायक बाप की लायक औलाद बनना होगा । मुझे ऐसा लगता है आपको क्या लगता है ?
इसी उम्मीद के साथ जयभीम ..! जयभारत ..!!
माँ/ बाप और ईश्वर से ज्यादा दिया । हमने हमारे बाबासाहब के प्रति क्या किया ? क्योंकि हमारा भी फर्ज बनता है । के हमने कुछ ना कुछ तो भी करना चाहिए । लेकिन हमारे लोग सिर्फ बाते करते है ।
मगर कुछ भी नही करते है .!! जो हमारे मुक्तिदाताने हमसे उम्मीद की थी । उन्होंने हमारे सामने दो लक्ष रखे है ।
(1) हमें इस देश का शासक बनना..sss ????
(2) भारत को बौद्धमय बनाना..sssss ???? लक्ष बड़ा कठिन है । मगर हमने उसपर पूरा ध्यान केन्द्रित करना चाहिए । और यह लक्ष पूरा करना तभी संभव है , जब हम आपने आपको स्वाभिमानी बापकी स्वाभिमानी औलाद बना सके । लेकिन हमारी समस्या यह है की , हम नाम तो बाबा का लेते है । मगर काम बापू का करते है । जब तक हम .........
" जयभीम जयभीम गाते चलो और बापूजी का दर्शन लेते चलो ऐसी स्थिति जब तक हमारी है । तब यह बात नहीं होगी इसलिए हमे पहले लायक बाप की लायक औलाद बनना होगा । मुझे ऐसा लगता है आपको क्या लगता है ?
इसी उम्मीद के साथ जयभीम ..! जयभारत ..!!
Saturday, 26 July 2014
कांशीराम - दलित अधिकारिता हीरो
KANSHIRAM - Dalit Empowerment Hero
ऐसा लगता है कि एक पहले से निष्कर्ष है कि बाबा साहिब डा बीआर बाद अम्बेडकर, साहिब श्री कांशीराम एक ही आदर्श वाक्य, शक्ति, दृष्टि और समर्पण के साथ चार दशक से अधिक के लिए जल दलित सशक्तिकरण की लौ रखा है जो भारतीय राजनीति के परिदृश्य पर सबसे बड़ा व्यक्तित्व था. डॉ बी.आर. अम्बेडकर सदियों पुराने आदेश उखाड़ा और तरीके से बनाया है और भारतीय दलित जीवन के सभी क्षेत्रों में ऊंचाइयों को प्राप्त करने के लिए इसका मतलब है. उन्होंने कहा कि संवैधानिक रूप से उनके सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, शैक्षिक क्षेत्रों में बनाए पुरोहित वर्ग बनाया आदमी बाधाओं निकाल दिया. वह उन लोगों से छल से छीन लिया गया था क्या दलितों को बहाल. बाबा साहिब की जल्दी मौत राज्य शासन और उनके खो प्रतिष्ठा और विशेषाधिकारों हासिल करने के लिए एक बार फिर से भारत के मूल निवासियों को देखने के लिए अपने पोषित सपनों असहाय. साहिब श्री कांशीराम जीवन भर का बलिदान है के साथ इस विचार को पानी पिलाया और खो मैदान की बहुत फायदा हुआ. उन्होंने कहा कि शासकों और विषयों द्वारा मज़ा आया विशेषाधिकार का दलितों के प्रति जागरूक बनाया. अप्रैल 1965 में 14 वें पर उन्होंने शपथ ली "मैं बाबा साहिब डा बीआर का अधूरा मिशन पूरा हो जाएगा अम्बेडकर. मैं अपने समाज "के कल्याण के बाद देखने के लिए होगा. वह अपने परिवार, सभी दलित महिलाओं अपनी बहनों और सभी दलित पुरुषों अपने भाइयों, वह बाहर अपने जीवन के माध्यम से स्नातक रहने के लिए और अपने नाम में किसी भी संपत्ति का अधिग्रहण करने के लिए नहीं की कसम खाई दलित समाज की घोषणा की. वह अपने परिवार को अलविदा, पारिवारिक जीवन, परिवार अपने साथी भाइयों की गुलामी की जंजीरों को काटने के लिए आराम कहा. यह वह एक बौद्ध भिक्षु के शब्द के रूप में रखा. उन्होंने कहा कि दलित जनता साहिब कांशीराम ने अपने विश्वस्त सहयोगी के साथ अपने द्वि चक्र पर भारत की लंबाई और सांस बाहर के माध्यम से कूच एक संयुक्त चुनावी बल राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए और उन्हें शिक्षित करने के लिए बनाने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बौद्ध धर्म में कनवर्ट किया गया.
इसलिए बाबा साहिब के जीवन भर दुख के माध्यम से तैयार जमीन फिर से बंजर हो गया होता, कांशीराम, पूर्ण उत्साह के साथ यह जोता राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक क्रांति का बीज बोया, उसके पसीना परिश्रम के साथ यह पानी पिलाया नहीं था और दिन और रात के साथ यह पहरा द्वि साइकिल चलाना. उन्होंने कहा कि धर्म का वर्चस्व आदेश के सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों को चुनौती दी और दलितों समाज झूठी धार्मिक dogmas, भेदभावपूर्ण धार्मिक पुस्तकों और भी गलत आदमी बना देवताओं से छुटकारा पाने के लिए एक दृष्टि दी. कांशीराम एक महान जनता जुटाव कार्यकर्ता था; वह अपने लाभ के लिए उपयोग करने के लिए राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए आत्म सम्मान और समुदायों के सामूहिक विवेक के मूल्यों को समझा.
श्री कांशीराम भारत ruleover को उनके अधिकार हासिल करने के लिए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पीछे वार्ड शैक्षणिक और धार्मिक अल्पसंख्यकों के शामिल 85% भारतीय आबादी को शिक्षित करने के लिए काम किया. दलितों के भीतर जागरूक arousing जबकि श्री कांशीराम समय से दलित जनता के लिए निर्देश देने के लिए समय के लिए मूल्य आधारित नारे गढ़ा; इस तरह के एक "उसकी utni भागीदारी Jiski Jitni Sankhaya भरी," था. वह अपने वादा निभाया, जो शायद एक नेता था, उनके शब्दों को सच साबित कर दिया. वह रहते थे और अपने नाम में बाहर के साथ, एक नेता के रूप में किसी भी अचल या जंगम संपत्ति, किसी भी बैंक खाते, घर, भूमि भूखंड या फ्लैट की मृत्यु हो गई. अपने निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, वह फर्श पर सोया, छोटे hutments, किनारे ढाबों (ग्रामीण सड़क की ओर मकान खाने) में भोजन ले लिया है, एक साधारण दलित के रूप में रहते थे. वह सो रात में देखा गया था एक बार लंबी पत्थर दिलेरी पर, व्यावहारिक विचारों में और अपने लोगों के लाभ के लिए इसका इस्तेमाल करने के तरीके चिंतन करना, साहित्यिक ज्ञान के साथ उसे लैस करने के लिए दिन और रातों के लिए जाग रखने इसे आत्मसात करने के लिए इस्तेमाल सड़क paving.He के लिए रखा जिनमें से कई बीमार, बीमार,, नग्न अनपढ़ कपड़े पहने, खिलाया शोषण और मिस निर्देशित किया गया. दलितों कम leaderless और दिशा महसूस कर रहे थे जब साहिब श्री कांशीराम श्रद्धेय बाबा साहिब डा भीमराव अम्बेडकर की असामयिक मौत के बाद, सबसे चमकदार सितारा, के रूप में भारतीय राजनीतिक क्षितिज पर उभरे. अपने कठिन परिश्रम के सहारे बाबा साहिब, विद्वानों के अनुसंधान और राजनीतिक दृष्टि इतनी Shuders और Ati- Shuders बुलाया अपने हिंदू धार्मिक भाइयों के खिलाफ अंधविश्वासी ऊंची जाति के हिंदुओं की नफरत की संस्कृति को चुनौती देने, ऊंची जाति के वर्चस्व के जुए से दलित मुक्ति के लिए जमीन तैयार की.
साहिब श्री कांशीराम Ramdasia या चमार सिख परिवार, ब्राह्मणवादी जाति विभाजन की एक अछूत जाति में 15 मार्च 1934 को पैदा हुआ था. वह अपने पिता श्री हरि सिंह एवं माता श्रीमती बिशन कौर के सात बच्चों में से एक था. उन्होंने कहा कि पंजाब राज्य के रोपड़ जिले के ग्राम Khawaspur में पैदा हुआ था. उनके परिवार में, वह केवल स्नातक थे. उन्होंने कहा कि रक्षा, विस्फोटक अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशाला (ईआरडीएल) मंत्रालय में महाराष्ट्र राज्य के पुणे शहर में सेवा में शामिल हो गए. यहां उन्होंने एक Dheema Vana, उनके कार्यालय के एक निलंबित चतुर्थ श्रेणी दलित कर्मचारी के साथ संपर्क में आया था. स्वर्गीय श्री Dheema Vana डॉ .Ambedkar और बुद्ध Jyanties पर छुट्टी की मांग की. फिर ईआरडीएल बाबा साहिब और बुद्ध Yyanti की सालगिरह के कारण छुट्टियों को रद्द करने का आदेश दिया और Dewali के छुट्टी घोषित करने के अलावा तिलक Jyonti के साथ बदल दिया था. बाद में श्री Dhemma Vana के इन दोनों मांगों को स्वीकार कर लिया गया है और वह बहाल किया गया था. श्री Dheema Vana के दिल डॉ अम्बेडकर के लिए विश्वास और प्यार से भरा हुआ था. Dheema से प्रेरणा मिलने के बाद, कांशीराम पर और डॉ अम्बेडकर ने साहित्य का अध्ययन किया. यह वह ही रात में कई बार 'जाति के विनाश' को पढ़ने के लिए कहा है. वह तो, आगे दलितों का एकजुट लाखों का मिशन ले जाने के उनके सदियों पुरानी गुलामी और कष्टों के लिए उन्हें याद दिलाने के भाईचारे बांड के माध्यम से उन्हें बंधन को सेवा से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने साथ माना जा ताकत में उन्हें मजबूत करने के लिए इतनी के रूप में उनकी गहरी नींद से जगाने के लिए उन्हें हिला कर रख दिया. वह अकेले ही दलितों में सशक्तिकरण की भावना जागृत.
उसे उन करीब वह सभी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग के और 6 दिसम्बर 1978 पर BAMSEF नामित अल्पसंख्यकों और फिर शुरू करने के लिए उन्हें तैयार के कर्मचारियों की अपनी पहली सामाजिक एवं शिक्षाप्रद संगठन निर्मित करने के लिए काम कितना मुश्किल बताना उनके युवा के sangarash Simiti (आंदोलनकारी मंच) "डी एस -4" 6 दिसंबर, 1981 पर.
राजनीतिक सत्ता में सही हिस्सेदारी पाने के लिए ठोस आधार तैयार करते हैं, वह अप्रैल on14th उनकी बहुजन समाज पार्टी शुरू की, 1984.Kashi राम हमारी संसदीय प्रणाली में प्रतिनिधित्व किया है और एक बदलाव के लिए तरस रहे थे तहत कर रहे हैं जो उन लोगों के प्रति जागरूक हिला कर रख दिया. वह अपनी राजनीतिक संगठन बसपा के लिए काम करने के लिए आम जनता के समेकित से, कई ने अपने संदेश अपने लोगों के लिए बहुत प्रेरणादायक था "मिशन का Kaam" के रूप में बसपा के लिए काम करने के लिए वहाँ voluntaried, कि एक बार एक बसपा स्वयंसेवक तो हमेशा से था. कारण कांशीराम की राजनीतिक दर्शन करने के लिए जल्द ही बसपा एक राष्ट्रीय पार्टी बन गई और पहले के दशकों का गठन किया गया है जो कई राजनीतिक दलों के पीछे अब तक छोड़ने, तृतीय स्थान प्राप्त किया. साहिब काशी राम ने स्वयं लोकसभा के लिए (1991 और 1996) में दो बार जीता. लेकिन 1998 में उन्होंने कहा कि वह कम से कम 100 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों से जीतने के लिए ताकत लाभ तक किसी भी राजनीतिक पद के लिए चुनाव लड़ने के लिए नहीं देने का वादा किया. चुनाव जीतने की होड़ निखरा और उत्तर प्रदेश विधानसभा में इसे तीन बार अन्य दलों के साथ गठबंधन में उत्तर प्रदेश की Behan मायावती मुख्यमंत्री बनाया 1993 कांशीराम की राजनीतिक गतिशीलता में चुनाव लड़ा 162 से बाहर सीटें won66, लेकिन वह भी उन लोगों से अनुचित दबाव को उपज नहीं था मुख्यमंत्री के खोने की कीमत पर. गादी
लोकसभा चुनाव में सीटें जीतने का ग्राफ भी नाटकीय रूप से गुलाब:
सीटें लोकसभा
शून्य 8th
04 9
03 10 वीं
11 11 वीं
05 12 वीं
15 13 वीं और 14 वीं
लोकसभा में इस दिशा में उनके सतत प्रयासों, 208 सीटों के साथ उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 2007 में स्पष्ट बहुमत जीतने 111 सीटों पर दूसरा खड़े और कम से कम 5000 मतों के अंतर के साथ अन्य 60 सीटें खोने का फल बोर. बहन मायावती, अब राष्ट्रीय अध्यक्ष बसपा स्पष्ट बहुमत के साथ राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी. लेकिन साहिब अफसोस की अपनी ताकत पर उत्तर प्रदेश में उनकी बसपा सरकार खेती के दिन देखने के लिए भाग्यशाली नहीं था.
साहिब कांशीराम के निधन के साथ निहित हितों बसपा, अपने दैनिक रक्त खुराक के साथ यह मनुष्य जो साहिब जी के मस्तिष्क बच्चे में घुसना करने के तरीके पाया है. स्पष्ट उदाहरण यह राज्य विधानसभा में चार सीटें जीती और अब शून्य करने के लिए कम हो गया है एक बार जहां जम्मू और कश्मीर राज्य के उद्धृत किया जा सकता है. साहिब श्री कांशीराम द्वारा बार बार दोहराया Chamcha राज उनके बलिदान प्राप्त करने के लिए दिन से मैदान दिन आ रहा है. बसपा के गठन के बाद से 24 साल की अवधि के दौरान, multinationalisim और नई आर्थिक व्यवस्था की कांग्रेस सरकार के कार्यक्रमों स्वर्गीय प्रधानमंत्री पी.वी. के तहत नरसिंह राव, या श्री की रथ यात्रा. 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के गिराने में बनी लालकृष्ण आडवाणी, भारत संघ के मामलों को चलाने में हिस्सेदारी के लिए राजनीतिक सत्ता पाने के कांशीराम के कार्यक्रम से दलितों दूर बोलबाला नहीं सकता. क्रेडिट दलितों अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग के या अन्य अल्पसंख्यकों, राज्य या अन्य जातीय समूहों के खिलाफ हिंसा से बचा संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती नहीं किया गठन 85% भारतीय आबादी से अधिक होने कि कांशीराम को जाता है. संख्या, लोकतांत्रिक भारत में नहीं हिंसा काम हम सब कांशीराम के आगे झुकना जिसके लिए कोई छोटी उपलब्धि नहीं है कि कांशीराम के सूत्र.
हर एक और तरह, वह यह सदमा सहन करने के पीछे छोड़ दिया जाता है, जो उन लोगों के लिए दर्दनाक है, हालांकि शरीर के नश्वर फ्रेम छोड़ना पड़ा. तो साहिब श्री कांशीराम जी के साथ हुआ. वह कुछ समय के लिए अच्छा स्वास्थ्य रखने नहीं किया गया था, लेकिन वह 15 मार्च को एक बैठक के दौरान हैदराबाद में नुकसान उठाना पड़ा मस्तिष्क पक्षाघात, 2003 भ्रूण साबित कर दिया. उन्होंने कहा कि नई दिल्ली बत्रा अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया और तीन साल के लिए विशेषज्ञ इलाज के तहत बना रहा. दुर्भाग्यपूर्ण अंत में 11 में 12, 20 में सोमवार 9 अक्टूबर 2006 को आया था, हनुमान रोड, नई दिल्ली, Behan मायावती के सरकारी निवास. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, लोकसभा लालकृष्ण में विपक्ष के नेता की तरह राष्ट्रीय व्यक्तित्व आडवाणी. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, शरद पवार, लालू यादव, रामविलास पासवान और अन्य दलितों के मसीहा को श्रद्धांजलि दी. उनका अंतिम संस्कार लाख ने भाग लिया और वह 2006/09/10 पर निगम बोध घाट नई दिल्ली में अंतिम संस्कार किया गया. उन्होंने कहा कि उनके पार्थिव शरीर को किसी भी नदी में डूब लेकिन दिल्ली और Lukhnow में बसपा पार्टी मुख्यालय में आयोजित नहीं किया जा है कि उसकी इच्छा के पीछे छोड़ दिया है. उन्होंने कबीर साहिब, एक महान फकीर "जब हाम ऐ जगत मुख्य, जग हंसा हम Roay, तो ऐसी करनी कर Chaloo, हम Hansain, जग Roay" के भजन के अनुसार उनके जन्म और मृत्यु योग्य (बच्चे के जन्म पर, बच्चे रोता है, लेकिन इलाके मनाता ) कि मृत्यु के समय इलाके शोक व्यक्त किया लेकिन व्यक्ति मर खुशी महसूस करता है तो खुशी से जन्म, एक, समाज की भलाई के लिए काम करना चाहिए
मौत से पहले साहिब श्री कांशीराम उसके वारिस और 18-09-2003 पर बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में Behan मायावती बनाया. हमें वह कई झगड़े बसपा में प्रदर्शित देखें है, के रूप में संयुक्त जनता को देखने के लिए सक्षम है देखो कितनी दूर है, और इन पाश छेद प्लग करने के लिए करते हैं. श्रम और कांशीराम की पीड़ा मन और एकता के अपने परीक्षण किया फार्मूले में रखा पालन किया जाना चाहिए. उनके साथियों ने अपने आदर्शों से पर्ची, तो यह उसकी अब संयुक्त जनता के लिए एक दुखद टिप्पणी और दुर्भाग्य होगा. चापलूसी या Chamchagiri दलित मामलों से दूर रखा जाना चाहिए. बहन मायावती साहिब श्री कांशीराम Chamchagiri या चापलूसी की वर्तमान दिन गंदगी से बाहर खींच के रूप में एक ही समर्पण के साथ पार्टी को मजबूत करना होगा.
साहिब श्री कांशीराम तक किसी भी जातीय समूह के खिलाफ हिंसा के लिए कोई जगह नहीं छोड़ रहा है, "लोकतांत्रिक भारत में नंबर नहीं हिंसा काम" अपने दूरदर्शी कहावत दलितों केवल लोकतांत्रिक तरीकों से नई दिल्ली गादी के लिए दौड़ जीत चाहिए के लिए याद किया जाएगा. हमें राष्ट्रीय एकता हासिल करने के लिए विरोधी स्थिति -quo बलों को प्रोत्साहित करते हैं.
छत्रपति शाहू जी महाराज
CHHATRAPATI SHAHU JI MAHARAJ
| Born | June 26, 1874 |
|---|---|
| Died | May 6, 1922 (aged 47) |
राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज अपने समय के एक महान समाज सुधारक माने जाते कोल्हापुर के भारतीय रियासत के राजा थे. शाहू जी एक महात्मा ज्योतिबा फुले के कट्टर अनुयायी और डॉ बी आर के महान प्रशंसक थे अम्बेडकर. शाहू जी तेल कोल्हू "तेली" जाति के थे लेकिन दलित समाज के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया. उन्होंने कहा कि इस गिने जो उच्च जाति ब्राह्मण मंत्रियों से सख्त विरोध के खिलाफ था Kohlapur StateServices में पिछड़े वर्गों के लिए 50% आरक्षण को मंजूरी देने से जुलाई 1902 प्रशासन में और 26 पर ब्राह्मण वर्चस्व को चुनौती
राज्य में ब्राह्मणों की आबादी में 3% शेयर के खिलाफ प्रशासन में 98% से अधिक. वह अपने राज्य पर पूरा अधिकार assertedhis और उसके प्रसिद्ध जीवनीकार श्री अटल बिहारी अनुसार उदास वर्ग के लोगों के लिए कल्याण योजनाओं के एक नंबर ले लिया Latthe "वह कभी Kohlapur के फेंक दिया और राष्ट्र कभी अपने लंबे और शानदार इतिहास में उत्पादन किया है कि शक्तिशाली लोगों में से एक पर बैठ गया है कि सबसे बड़ी महाराजा था". अच्छा प्रशासन के लिए Chhatarpati साहू जी महाराज की चिंता मैं Kohlapur के सिंहासन पर हूँ हालांकि, मैं सैनिक, किसान या मजदूर के रूप में अपने आप को फोन करने पर गर्व महसूस हो रहा है "अपने बयान से आंका जा सकता है. मद्रास में बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मैं जिसका दयनीय हालत भी एक पत्थर दिल इंसान पिघल जाएगा उन लोगों के लिए राजा लेकिन दोस्त के रूप में यहाँ नहीं कर रहा हूँ "कहा. उन्होंने Kohlapur राज्य संपत्ति के रूप में धार्मिक स्थानों संपत्तियों की घोषणा के साथ मंदिर पुजारियों के रूप में गैर ब्राह्मण पुरुषों के प्रशिक्षण की अनुमति के लिए कानून पारित कर दिया. उन्होंने कहा कि भविष्य में Shankaachariyas की नियुक्ति Kohlapur राज्य अधिकार के साथ किया जाएगा कि आदेश दिया. उन्होंने कुलकर्णी प्रणाली को समाप्त कर दिया और अपने विषयों के लिए एक कारण की घंटी और धर्मनिरपेक्षता बज Kshatra जगद्गुरु नियुक्त किया है. वह एक ब्राह्मण पुजारी बाहर के साथ विवाह का आयोजन करने को मंजूरी दे दी. वह अपने विषयों के बीच अंतर जाति विवाह को बढ़ावा दिया. हालांकि यह लोकमान्य तिलक और कुछ अन्य लोगों द्वारा समर्थित थे जो तर्कहीन सोच अंधविश्वासी ब्राह्मणों द्वारा महाराजा के प्रति बीमार होगा बनाया. Bachward वर्गों के लिए उच्च शिक्षा के अधिकार का विरोध करते हैं, तिलक रिकॉर्ड पर है 11November, 1917 (Javatmal Maharathtra) "दिनांक अपने भाषण में से एक में कहा है दर्जी सिलाई मशीन, किसानों का प्रयोग करेंगे उनके हल और व्यापारियों संतुलन के पैमाने में परिषद "तिलक और कांग्रेस पार्टी ही प्राथमिक शिक्षा की जरूरत है, जहां उनके पैतृक ट्रेडों, का पालन करने के लिए peopled Bachward वर्गों के लिए किया गया था. उसकी समतावादी विचारों को लागू करने के लिए निर्धारित ताकि उन्हें विरोध सभी अपने विरोधियों का सामना करने के लिए तैयार किया गया था. 15 अप्रैल 1920 में Chhatarpati साहू जी महाराज तिलक अपने भाषण ब्राह्मण v / s Brahmantra में इस तरह के विचारों को व्यक्त करने के लिए शर्मिंदा हो गया होता ", तिलक को इस प्रकार उत्तर दिया. तिलक प्राथमिक educatioin के बाद माध्यमिक शिक्षा लेने के लिए नहीं अछूत की सलाह दी. उन्होंने कहा कि उन्हें अपने जाति के शिल्प जानने के लिए उन्हें जानने के लिए चाहते थे, इस प्रकार वह अछूत के लिए जाति के पेशे के संविधान में विश्वास नहीं है और "उन्हें करने के लिए उन्हें उच्च शिक्षा देने में हालांकि महाराजा ब्राह्मणों लेकिन ब्राह्मणवाद और ब्राह्मण तरीके और के खिलाफ नहीं था उनके आधा सुधारों दिल. V.D. तरह इतने अच्छे मन से ब्राह्मणों Topkhane, गोपाल कृष्ण गोखले, राजाराम शास्त्री प्रगतिशील प्रयासों का समर्थन किया.
शाहू जी Yeshwantrao Ghatge के रूप में वर्ष 1874 में 26 जुलाई को जन्म हुआ था. उन्होंने यह भी अप्पासाहेब Ghatge और उनकी पत्नी Radhabai बुलाया नारायण Dinkarrao Ghatke का ज्येष्ठ पुत्र था,. नारायण Dinkarrao Ghatke Kagal के प्रमुख थे और उनकी पत्नी .. नारायण Dinkarrao Ghatke तो Yeshwantrao Ghatge पैदा हुआ था जहां Kohlapur में Laxminivas पैलेस में रहते थे Kohlapur राज्य को रीजेंट था आज के कर्नाटक राज्य में है कि Mudhol के राजा की बेटी थी.
वह केवल तीन साल का था जब साहू जी महाराज 12 वर्ष और उसकी मां की उम्र में अपने पिता को खो दिया. शाहू अपने पिता की देखभाल के अंतर्गत अपने पहले शिक्षा प्राप्त की. केवल 10 साल का एक बच्चा, वह Anandibai, 17 मार्च पर कोल्हापुर के Chhatarpati महाराजा शिवाजी चतुर्थ (Narayanarao) की विधवा, 1884 द्वारा अपनाया गया था जब भाग्य यह Yeshwantrao Ghatge होता वह Kohlapur छत्रपति के सिंहासन पर चढ़ा और दिया गया था Chhatar पति साहू जी महाराज के रूप में नाम. बड़े हो साहू जी महाराज पांच फुट और ऊंचाई में नौ इंच से अधिक थी और एक असली मराठा राजा की राजसी उपस्थिति बोर. कुश्ती छत्रपति की पसंदीदा खेलों में से एक था
शाहू जी महाराज 1 पर Laxshmibaisaheba से शादी की थी, April1891 तो केवल 11 साल की उम्र में दुल्हन. वह सतारा .Sahu जोड़े के छत्रपति चार बच्चों के साथ आशीर्वाद दिया था साथ बड़ौदा होने रक्त संबंध से एक मराठा ठाकुर श्री मेहरबान Gunajirao खानविलकर की बेटी थी.
महाराज डॉ बी.आर. साथ cotact में आया वे Dattoba पवार और Dittoba दलवी (कलाकार) और उनकी एसोसिएशन द्वारा शुरू किए गए थे, जब अम्बेडकर काफी उनके क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित था 1922 साहू जी में शाहू जी महाराज का अचानक अंत तक खो दिया है. महाराज जी हमेशा संकट में पाया अछूतों से किसी भी शरीर के लिए हर तरह से मदद करने के हाथों व्रत. उन्होंने कहा कि डॉ बी.आर. मुलाकात 1917-1921 के दौरान कई बार अम्बेडकर. डॉ अम्बेडकर दलितों साहू जी महाराज के बीच में एक जागृति लाने के बारे में एक पाक्षिक समाचार पत्र शुरू करने की इच्छा व्यक्त की जब इस नेक काम के लिए Rs2,500.00 चिह्नित. डॉ अम्बेडकर 31 जनवरी, 1920 पर "Mooknayak" (गूंगा के नेता) शुरू कर दिया. डॉ अम्बेडकर सितम्बर 1921 में पढ़ाई के लिए अपने को पूरा करने में वित्तीय समस्याओं का सामना करना पड़ा इसके अलावा जब साहू जी वह उसे करने के लिए किसी भी तरह की मदद के लिए किसी भी समय के लिए लिख सकते हैं कि डॉ अम्बेडकर को आश्वासन साथ Rs750.00 भेजा. Mooknayak वित्तीय व्यथित शाहू जी महाराज में उतरा फिर जब साहू जी महाराज, Rs1000.00 21 वीं फरवरी जनवरी 1921and में Rs750.00 दान करके इसे बाहर निकाला 5 अक्टूबर 1921 को उसकी लंदन पते पर डॉ अम्बेडकर के लिए एक जांच के लायक Rs1500.00 भेजा 1921. अछूत का पहला सम्मेलन Mangaon Kohlapur पर शाहू जी महाराज (21-22 मार्च) 1920 के नेतृत्व में आयोजित किया गया था, डॉ अम्बेडकर अध्यक्ष थे. महाराजा वे उनके सुधार के लिए काम करेंगे, जो डॉ अम्बेडकर में एक नेता पाया था कि सभा में बताया.
सिर और दिल के शाहू जी महाराज का गुण उसे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय और से मानद LLD अर्जित; G.C.S.I; G.C.V.O; G.C.I.E; महारानी विक्टोरिया, क्रमशः सह शून्य और Empiral दरबार के ड्यूक से खिताब. तो कभी पैदा हुआ है जो प्रकृति के कानून के अनुसार मरने के लिए है. कुछ लोग दूसरों के लिए जीते हैं और वे उनके निधन के बाद उम्र याद किया जाता है. Satarpati जी महाराज अचानक 48 साल का एक प्रमुख उम्र में दूर 6 मई 1922 को पारित कर दिया. उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास में अमिट छाप छोड़ दिया है. वह बुद्धिमान, समर्पण, शक्ति के साथ काम किया है और कई बाधाओं के बावजूद अपने अधिकार डाला. उन्होंने कहा कि भारतीय दलित सशक्तिकरण के इतिहास में जाना होगा
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